⚖️ Justice Surya Kant बने भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश: अब नज़रें लंबित मामलों और SIR केस पर

24 नवम्बर 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जस्टिस सुर्या कांत को भारत के 53वें Chief Justice of India (CJI) के रूप में शपथ दिलाई। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कई शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारी मौजूद रहे।

जस्टिस कांत ने पूर्व CJI जस्टिस भूषण आर. गवई की जगह कार्यभार संभाला और अब वे फरवरी 2027 तक देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर रहेंगे। लगभग 14–15 महीने का यह कार्यकाल भारतीय न्यायपालिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


🏛️ हरियाणा के गांव से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

जस्टिस सुर्या कांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा में हुआ। उन्होंने 1980 के दशक में हरियाणा के हिसार से वकालत की शुरुआत की और बाद में चंडीगढ़ में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सामने प्रैक्टिस की। आगे चलकर वे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने, फिर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त हुए।

First-generation lawyer होने की वजह से उनका सफर आम विद्यार्थियों और युवा वकीलों के लिए एक प्रेरणादायक कहानी की तरह देखा जा रहा है।🎓


📌 शपथ से पहले ही साफ रोडमैप: Pendency कम करना सबसे बड़ी प्राथमिकता

शपथ लेने से पहले ही जस्टिस कांत ने साफ किया था कि उनकी “पहली और सबसे बड़ी चुनौती” लंबित मामलों (pendency) को कम करना होगी। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही करीब 90,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि देशभर की अदालतों — ज़िला अदालतों, हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट — को मिलाकर 5.29 करोड़ से ज्यादा मामले पेंडिंग बताए जाते हैं।📊

उन्होंने संकेत दिया कि वे दो मोर्चों पर एक साथ काम करना चाहते हैं:

  • पुराने संवैधानिक मामलों (Constitution Bench cases) का जल्द निपटारा
  • कुल लंबित मामलों की संख्या घटाने के लिए संरचनात्मक सुधार

सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर की रिपोर्ट के अनुसार, कांत स्पष्ट रूप से यह बताना चाहते हैं कि पुराने संविधान पीठ मामलों की साफ-सुथरी सुनवाई और न्याय तक आसान पहुंच उनकी प्राथमिकता होगी।


🤝 Mediation: “गेम–चेंजर” के रूप में ऑफ–कोर्ट सुलह

नए CJI ने mediation को न्यायिक सुधार का केंद्र बताया है। उन्होंने कहा कि यदि विवाद अदालत के बाहर सुलझ जाएँ, तो न केवल समय बचेगा बल्कि लोगों को जल्दी और सस्ता न्याय भी मिल सकेगा।

उनका मानना है कि:

  • Mediation को संस्थागत रूप से मजबूत करना होगा
  • Lower courts, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट—तीनों स्तरों पर mediation culture विकसित करना होगा
  • सरकारी विभागों के बीच चल रहे पुराने विवाद भी mediation के ज़रिए सुलझाए जा सकते हैं

यदि यह मॉडल सफल होता है, तो लाखों केस अदालत आने से पहले ही निपट सकते हैं, जो pendency कम करने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।⚙️


🗳️ SIR (Special Intensive Revision) केस: नए CJI के लिए अहम कसौटी

नए CJI के न्यायिक कार्यकाल में जिन मामलों ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, उनमें से एक है बिहार में वोटर लिस्ट की Special Intensive Revision (SIR) पर चल रही सुनवाई। इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 65 लाख वोटरों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

जस्टिस सुर्या कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने:

  • Election Commission of India (ECI) से 65 लाख हटाए गए वोटरों का डेटा स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर लाने को कहा
  • ECI को निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें कारण बताने की पारदर्शी व्यवस्था हो
  • यह स्पष्ट किया कि SIR एक “ongoing exercise” है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष से पहले पूरे डेटा और प्रक्रिया की समीक्षा ज़रूरी है

इस केस में कोर्ट ने यह भी माना कि मामला केवल तकनीकी गलती का नहीं, बल्कि “trust deficit” यानी भरोसे के संकट का है — जनता, राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच।

Chief Justice बनने के बाद जस्टिस कांत से उम्मीद की जा रही है कि वे इस जैसे मामलों को तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को और मजबूत करेंगे।🗳️✨


⚖️ महत्वपूर्ण निर्णय जिनसे बनती है उनकी न्यायिक पहचान

सुप्रीम कोर्ट में रहते हुए जस्टिस सुर्या कांत कई बड़े और संवेदनशील मामलों का हिस्सा रहे हैं। इनमें शामिल हैं:

  • Article 370 से जुड़ी सुनवाई और फैसलों में भागीदारी
  • आरोपियों के अधिकार, भ्रष्टाचार विरोधी मामलों और सेवा विवादों पर महत्वपूर्ण निर्णय
  • सशस्त्र बलों के लिए One Rank One Pension (OROP) योजना को लेकर फैसले में भूमिका

इन फैसलों से उनकी संवैधानिक समझ, सामाजिक सरोकार और संतुलित दृष्टिकोण सामने आता है।


📊 आगे की राह: चुनौतियाँ और उम्मीदें

Chief Justice Surya Kant के सामने कुछ प्रमुख चुनौतियाँ हैं:

  • सुप्रीम कोर्ट के करीब 90,000 लंबित मामलों का बोझ कम करना
  • देशभर की अदालतों में 5.29 करोड़ से अधिक पेंडिंग केस को घटाने के लिए दिशा दिखाना
  • पुराने संविधान पीठ मामलों (जैसे, महत्वपूर्ण अधिकार और संघ–राज्य संबंध से जुड़े मुद्दे) को प्राथमिकता देना
  • न्यायपालिका पर बढ़ती सार्वजनिक निगरानी और सोशल मीडिया आलोचना के बीच संस्थान की विश्वसनीयता बनाए रखना

जस्टिस कांत ने साफ कहा है कि वे सोशल मीडिया ट्रोलिंग से दबाव महसूस नहीं करते और “fair criticism” का स्वागत करते हैं। इससे संकेत मिलता है कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही के पक्षधर रहते हुए भी न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा को कायम रखना चाहते हैं।💬


📝 निष्कर्ष: “कांत युग” से न्याय व्यवस्था को क्या उम्मीद?

जस्टिस सुर्या कांत का कार्यकाल भले ही लगभग डेढ़ साल का हो, लेकिन यह समय भारतीय न्यायपालिका के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। यदि वे लंबित मामलों में ठोस कमी लाने, mediation को मुख्यधारा में लाने और SIR जैसे संवेदनशील लोकतांत्रिक मामलों पर संतुलित व पारदर्शी रुख बनाए रखने में सफल होते हैं, तो इसे “क्लीन–अप और कन्फिडेंस–बिल्डिंग फेज” के रूप में याद किया जा सकता है।

आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि:

  • क्या सुप्रीम कोर्ट की pendency वास्तव में कम होती है?
  • क्या mediation सच में आम नागरिक के लिए तेज़ और सस्ता विकल्प बन पाता है?
  • और क्या SIR जैसे जटिल मामलों में अदालत ऐसी मिसाल कायम करती है जो चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा और मजबूत कर दे?

अभी के लिए इतना तय है कि 53वें CJI के रूप में जस्टिस सुर्या कांत से देश को बहुत बड़ी उम्मीदें हैं — खासकर “तेज़, सस्ती और भरोसेमंद न्याय व्यवस्था” के सपने को हकीकत के करीब लाने की दिशा में।✨⚖️

Previous Post Next Post