नई दिल्ली, 12 सितंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट आज, 12 सितंबर 2025 को, फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के “बड़े षड्यंत्र” मामले में जमानत की मांग करने वाले कार्यकर्ताओं शरजील इमाम, उमर खालिद, गुलफिशा फातिमा और मीरान हैदर की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। इन कार्यकर्ताओं को गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 सितंबर 2025 को इनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके बाद इन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 53 लोगों की मौत और 700 से अधिक घायलों के साथ यह दंगा भारत की राजधानी के इतिहास में एक काला अध्याय है। इस लेख में हम इस मामले, सुनवाई और इसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
🔍 2020 दिल्ली दंगे: क्या था मामला?
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा में 53 लोग मारे गए और 700 से अधिक घायल हो गए। दिल्ली पुलिस ने इस हिंसा को “पूर्व नियोजित और सुनियोजित षड्यंत्र” करार देते हुए शरजील इमाम, उमर खालिद और अन्य कार्यकर्ताओं को इसके “मास्टरमाइंड” के रूप में नामित किया। पुलिस का दावा है कि इन लोगों ने भड़काऊ भाषण दिए और व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए हिंसा को बढ़ावा दिया।
शरजील इमाम को 28 जनवरी 2020 को और उमर खालिद को 14 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था। इनके खिलाफ UAPA और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए, जिनमें आपराधिक साजिश, दंगा भड़काने और हत्या जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
⚖️ दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला: जमानत क्यों खारिज?
2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की खंडपीठ ने शरजील इमाम, उमर खालिद, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद सलीम खान, शिफा-उर-रहमान, अतहर खान, अब्दुल खालिद सैफी और शादाब अहमद की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि “इनका इस साजिश में प्रथम दृष्टया गंभीर रोल था” और उनके भड़काऊ भाषणों ने मुस्लिम समुदाय को बड़े पैमाने पर उकसाया।
“यह कोई सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी, जिसका उद्देश्य देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाना था।” – दिल्ली हाई कोर्ट
कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबी कैद और मुकदमे में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकता, खासकर UAPA जैसे गंभीर मामलों में। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि यह हिंसा “राष्ट्र को बदनाम करने की साजिश” थी, जिसमें शरजील और खालिद ने चक्का जाम और हिंसक प्रदर्शनों की योजना बनाई।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: क्या मिलेगी राहत?
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ शरजील इमाम (6 सितंबर), उमर खालिद (10 सितंबर), गुलफिशा फातिमा और मीरान हैदर ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दायर की। आज, 12 सितंबर 2025 को, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। मीरान हैदर की याचिका जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ के समक्ष होगी।
आरोपियों ने तर्क दिया है कि पांच साल से अधिक समय तक जेल में रहना और मुकदमे में देरी उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उमर खालिद ने कहा कि व्हाट्सएप ग्रुप में होना कोई अपराध नहीं है, और उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री या पैसा बरामद नहीं हुआ। शरजील ने दावा किया कि वह अन्य आरोपियों से पूरी तरह अलग थे और हिंसा के स्थान या समय से उनका कोई संबंध नहीं था।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि यह एक “क्लिनिकल और पैथोलॉजिकल साजिश” थी, जिसमें शरजील और खालिद ने भड़काऊ भाषण दिए और व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए प्रदर्शनों को संगठित किया।
🙌 पहले मिली जमानत: समानता का सवाल
इस मामले में कुछ सह-आरोपियों को पहले जमानत मिल चुकी है, जिसे आधार बनाकर शरजील और खालिद ने जमानत मांगी। नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा को जून 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दी थी, जबकि पूर्व कांग्रेस पार्षद इशरत जहां को मार्च 2022 में जमानत मिली।
हाई कोर्ट ने इन जमानतों को “पूर्ववर्ती मिसाल” नहीं माना और कहा कि शरजील और खालिद की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में “प्रथम दृष्टया अधिक गंभीर” थी।
😡 सोशल मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया
इस मामले ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। कुछ लोग शरजील और खालिद को “राष्ट्र-विरोधी” मानते हैं, जबकि अन्य का कहना है कि लंबी कैद बिना मुकदमे के “प्रक्रिया को सजा के रूप में इस्तेमाल” करने का उदाहरण है। उमर खालिद की पार्टनर बनोज्योत्सना लाहिरी ने कहा, “पांच साल तक बिना मुकदमे के जेल में रखना अपने आप में जमानत का आधार है। हम सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद करते हैं।”
X पर एक यूजर ने लिखा, “उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत मिलनी चाहिए। पांच साल तक जेल में रहना और अभी तक ट्रायल शुरू न होना अन्याय है।” 😔 वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा, “हाई कोर्ट ने सही फैसला लिया। यह साजिश देश के खिलाफ थी।” 😡
🔮 आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें
सुप्रीम कोर्ट की आज की सुनवाई इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। UAPA के सख्त प्रावधानों के तहत जमानत मिलना मुश्किल होता है, लेकिन लंबी कैद और मुकदमे में देरी जैसे आधार जमानत के पक्ष में जा सकते हैं।
पिछले साल, दिसंबर 2024 में, उमर खालिद को परिवार में शादी के लिए सात दिन की अंतरिम जमानत मिली थी, जो उनके पक्ष में एक सकारात्मक संकेत हो सकता है। उमर खालिद के समर्थकों और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (JNUSU) ने 13 सितंबर को एकजुटता मार्च की घोषणा की है।
🌟 निष्कर्ष: न्याय की उम्मीद
2020 दिल्ली दंगों का यह मामला न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी संवेदनशील है। शरजील इमाम, उमर खालिद और अन्य की जमानत याचिकाएं आज सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण मोड़ ले सकती हैं। यह सुनवाई न केवल उनके भविष्य को तय करेगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि भारत का司法 तंत्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच कैसे संतुलन बनाता है।
क्या आपको लगता है कि इन कार्यकर्ताओं को जमानत मिलनी चाहिए? इस मामले पर आपकी राय क्या है? कमेंट में साझा करें! 💬
